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प्रिय अभिभावक, सादर नमस्कार!
आज मैं अपने विचार आपके साथ सांझे करना चाहता हूँ कि 'भगवान महावीर पब्लिक सी. से. स्कूल' शुरू करने का वास्तविक उद्देश्य क्या है और हम अपने बच्चों को इस स्कूल में क्यों पढ़ाएँ?
हम अभिभावक अपनी संतान को अच्छा डॉक्टर, अच्छा वकील, अच्छा इंजीनियर, अच्छा आई. ए. एस. अधिकारी तो बनाना चाहते हैं, लेकिन अपनी संतानों को अच्छा इंसान बनाना नहीं चाहते। अच्छे व्यक्तित्व का होना अच्छे अंकों पर निर्भर करता है। हम अपने बच्चों को यह बताना चाहेंगे कि शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका का साधन मात्र ही नहीं है, वरन् जीवन में निखार लाने वाला माध्यम भी है। अगर आप अपनी संतानों को जीने की कला को सिखाना चाहते हैं, तो उन्हें आप को अच्छी शिक्षा के साथ-साथ उन्हें संस्कारों से भी सिंचित करना होगा; क्योंकि शिक्षा और संस्कार में बहुत फर्क होता है। जहाँ शिक्षा हमें जीवन-निर्वाह की कला सिखाती है, वहीं संस्कार हमें जीवन-निर्माण की कला सिखाते हैं।
बच्चे कच्ची मिट्टी के मानिंद हैं, हमें उनके साथ रहकर कुम्हार की भूमिका निभानी चाहिए। कच्चे घियाने में नहीं सोचने, बच्चे देखकर सीखते हैं। यदि हमें अपनी संतानों में सुधाराओं को उम्मीद करनी है, तो हमें उन्हें सु-संस्कार देने होंगे। हम अध्यापन और संस्कारवान होगा। संस्कार जीवन में वही अभिभावक दे सकते हैं, जिन्होंने अपने जीवन में मुड़खानों को अपनाया है। जैसे प्रज्जवलित दीपक ही बुझे हुए दीपक को जलाने की क्षमता रखता है।
जिन मुनि श्री तरूण सागर जी का कहना है कि जीवन का निर्वाह सरल है। पशु-पक्षी भी किसी प्रकार से जीवन का निर्वाह कर लेते हैं, पेट भर लेते हैं, ज़िन्दगी जी लेते हैं, लेकिन पृथ्वी पर एकमात्र मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जो जीवन निर्वाह के साथ-साथ जीवन निर्माण भी कर सकने का पात्र रखता है। इसलिए यदि वह जीवन निर्माण की दिशा में नहीं बढ़ता, तो उसमें और पशु में कोई अंतर नहीं रहा। उनके द्वारा कहे गए ये सुविचार कितने सही हैं!
हम जानते हैं कि घना मयूरा को मुकुटा नहीं है, लोढ़ा पर ट्रिट जाना है। वैसे ही एक निश्चित उम्र गुज़रने के बाद बच्चों की संस्कार देना पालने ही नहीं होता, अभिभावक भी जान पड़ता है। यदि हमें समय में चाहते हैं कि हमारी संतान बुढ़ापे में हमारी लाठी बने, तो इसके लिए भी आपको अपने प्रति उनके क्या कर्त्तव्य होने चाहिए, यह ज्ञान उन्हें बड़े माँ-बाप की सेवा - शुश्रूषा करके उन्हें अनुभव करानी होगी। यदि आप माता - पिता या घर के बुजुर्गों की उँगली पकड़कर उन्हें मंदिर ले जाएँगे तभी तो कल वह आप बुझे माँगे। जो आपके 'बेटा - बेटी - पोता - पोती' आपका हाथ पकड़कर आपको मंदिर ले जाएँगे। संस्कार तो प्रतिबिंब मात्र हैं, वहाँ तो यही मिलता है, जो हम लुटाते हैं। आनंद लुटाओगे, तो आनंद मिलेगा; दुःख बाँटोगे, तो दुःख मिलेगा। खुशी बाँटोगे तो खुशी मिलेगी। संस्कार बाँटते चलो, ताकि नई पीढ़ी में संस्कार पनपते चले। किसी ने सच ही कहा है: 'नोवा पेड़ खडूर का, आम कहाँ से होय'!! तो आओ हम सब मिलकर संस्कार को एक संस्कारित पीढ़ी देने के प्रयास में सहभागी बनें और 'भगवान महावीर पब्लिक सी. से. स्कूल' के साथ जुड़ें !!
President
सुशील अग्रवाल
Bhagwan Mahaveer Public Sr. Sec. School